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सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की कोविड टीकाकरण नीति को सही ठहराया

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की कोविड टीकाकरण नीति को सही ठहराया है। कोर्ट ने कहा कि यह वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित है लेकिन किसी को टीका लगवाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि कोविड टीका न लगवाने वाले लोगों को सार्वजनिक सुविधाओं के इस्तेमाल से रोकने के आदेश राज्य सरकारों को हटा लेने चाहिए। 22 मार्च को तमिलनाडु, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सरकार ने कोरोना वैक्सीन को लेकर जारी किए गए उनके दिशा-निर्देशों का बचाव किया था।

सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की ओर से एएजी अमित आनंद तिवारी ने कहा था कि सार्वजनिक स्थानों पर जाने के लिए कोरोना वैक्सीन अनिवार्य करने के पीछे बड़ा जनहित है ताकि कोरोना का संक्रमण आगे नहीं बढ़े। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के उस दिशा-निर्देश का हवाला दिया जिसमें राज्यों को सौ फीसदी कोरोना वैक्सीनेशन कराने को कहा गया था। तमिलनाडु सरकार ने कहा था कि कोरोना का वैक्सीनेशन म्युटेशन रोकता है। बिना वैक्सीन लिए लोगों को संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है।

महाराष्ट्र सरकार ने कहा था कि राज्य सरकार ने दुकानों, मॉल इत्यादि सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश से पहले वैक्सीन लेना अनिवार्य किया है। राज्य सरकार की ओर से वकील राहुल चिटनिस ने कहा था कि याचिकाकर्ता का ये कहना सही नहीं है कि वैक्सीन अनिवार्य करना संविधान की धारा 14 और 21 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा था कि वैक्सीनेशन याचिकाकर्ता के अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है क्योंकि ये दूसरों के जीवन को भी प्रभावित करता है। मध्य प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि अधिकारों का संतुलन जरूरी है।

2 मार्च को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि उन्होंने वैक्सीन नहीं ली है। उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार ने वैक्सीन के सुरक्षित होने को लेकर कोई जानकारी लोगों के सामने नहीं रखी और न ही इस बात का कोई प्रमाण है कि क्या वाकई स्वस्थ लोगों को इसे लगाने की जरूरत है।

9 अगस्त 2021 को कोर्ट ने कोरोना के वैक्सीन के ट्रायल से संबंधित डाटा में पारदर्शिता लाने की मांग पर नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने कहा था कि हम कुछ मुद्दों पर सुनवाई कर रहे हैं। हम नोटिस जारी कर रहे है, लेकिन हम टीकाकरण को लेकर लोगों के मन में भ्रम पैदा नहीं करना चाहते हैं। कोर्ट ने कहा था कि देश वैक्सीन की कमी से लड़ रहा है। टीकाकरण जारी रहे और हम इसे रोकना नहीं चाहते हैं। कोर्ट ने कहा था कि आपको वैक्सीन की सुरक्षा को लेकर कोई संशय नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि इस याचिका से उन लोगों में भ्रम पैदा होगा जिन्होंने वैक्सीन लगवा रखी है। तब याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाते तो वैक्सीन को लेकर विश्वास की कमी लोगों को बीच रहेगी।

याचिका नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्युनाइजेशन के पूर्व सदस्य डॉक्टर जैकब पुलियेल ने दायर किया था। याचिका में कहा गया था कि कोरोना के वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल का डाटा सार्वजनिक किया जाए। याचिका में मांग की गई थी कि कोरोना संक्रमण के बाद होने वाले गंभीर प्रभावों का भी डाटा सार्वजनिक किया जाए। याचिका में मांग की गई थी कि जिन मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ी या जिनकी मौत हो गई उनके आंकड़ों का खुलासा होना चाहिए।

याचिका में कहा गया था कि दूसरे देशों में वैक्सीन देने वाले लोगों के डाटा का अध्ययन करने के बाद खून जमने या स्ट्रोक आने जैसी समस्या में मदद मिली। याचिका में कहा गया था कि कई देशों ने वैक्सीन के बाद के असर के आकलन होने तक वैक्सीन देना बंद कर दिया। यहां तक कि डेनमार्क जैसे देश ने एस्ट्रा जेनेका वैक्सीन पर प्रतिबंध लगा दिया। एस्ट्रा जेनेका वैक्सीन का नाम भारत में कोवीशील्ड है।

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