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बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री पर जजों, अधिकारियों ने जताई आपत्ति

बताया भ्रामक और तथ्यों से परे रिपोर्टिंग वाला, भारत की तरफ से पहले ही जताई जा चुकी है आपत्ति, बीबीसी की सफाई

बीबीसी की गुजरात दंगों को लेकर पीएम मोदी पर विवादित डॉक्यूमेंट्री को लेकर विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस डॉक्यूमेंट्री को लेकर देश के रिटायर्ड जजों, रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने बीबीसी को लेटर लिखा है। लेटर में कहा गया है बीबीसी की India: The Modi Question डॉक्यूमेंट्री ब्रिटिश साम्राज्य के भम्र के फिर से उठने का सबूत है। लेटर में कहा गया है कि अब और नहीं, ना हमारे नेता के साथ और ना ही भारत के साथ। लेटर में कहा गया है कि इस डॉक्यूमेंट्री में भारत के प्रति बीबीसी का पूर्वाग्रह और नकारात्म सोच दिखाई देती है। उन्होंने दावा किया कि यह भारत में अतीत के ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मूल रूप है, जो खुद को हिंदू-मुस्लिम तनाव को पुनर्जीवित करने के लिए जज और जूरी दोनों के रूप में स्थापित करता है। यह ब्रिटिश राज की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का हिस्सा था।

पीएम के बारे में पूर्वाग्रह से बात करने की अनुमति नहीं

लेटर में कहा गया कि यह हमारे नेता, साथी भारतीय एवं एक देशभक्त’ के खिलाफ पक्षपातपूर्ण आरोप पत्र है, जिसमें नकारात्मकता और पूर्वाग्रह भरा है। इसमें कहा गया है कि भले ही आपने एक भारतीय के रूप में किसी को भी वोट दिया हो, भारत के प्रधानमंत्री आपके देश, हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं। हम उनके बारे में किसी को भी खोखले तर्क देने और पूर्वाग्रह से पूर्ण बात करने की अनुमति नहीं दे सकते। इस लेटर पर 302 लोगों के साइन हैं। इसमें 13 रिटायर्ड जज, 133 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स(22 राजदूत) और 156 आर्म्ड फोर्सेज के ऑफिसर शामिल हैं। इस लेटर के कोऑर्डिनेटर पूर्व रॉ चीफ संजीव त्रिपाठी और पूर्व राजदूत बी. मुखर्जी हैं। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अनिल देव सिंह, पूर्व गृह सचिव एल सी गोयल, पूर्व विदेश सचिव शशांक, रॉ के पूर्व प्रमुख संजीव त्रिपाठी और एनआईए के पूर्व निदेशक योगेश चंद्र मोदी शामिल हैं।

भ्रामक और एकतरफा रिपोर्टिंग

लेटर में बीबीसी की सीरीज को लेकर कहा गया है कि यह न केवल भ्रामक और स्पष्ट रूप से एकतरफा रिपोर्टिंग है बल्कि यह एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत के अस्तित्व के 75 साल पुराने ढांचे पर सवाल उठाती है। वह देश जो लोगों की इच्छा के अनुरूप काम करता है। लेटर में कहा गया है कि सीरीज में साफ तौर पर तथ्यात्मक गलतियों के अलावा ‘कथित रूप से’ शब्दों का बार-बार यूज जो (तथ्यात्मक रूप से नहीं) किया गया है।

डॉक्यूमेंट्री में इस फैक्ट को दरकिनार किया गया है कि भारत का सुप्रीम कोर्ट के 2002 के गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की किसी भी भूमिका को स्पष्ट रूप से खारिज कर चुका है। साथ ही उस समय की राज्य सरकार पर लगे मिलीभगत और निष्क्रियता के आरोपों को भी खारिज कर चुका है।

बीबीसी: द एथिकल क्वेश्चन डॉक्यूमेंट्री बनाए

लेटर में कहा गया है कि समय आ गया है कि बीबीसी को यह बताया जाए कि भारत को ‘औपनिवेशिक, साम्राज्यवादी, नींद में चलने वाले बाहरी लोगों की जरूरत नहीं है। ऐसे लोग जिनका प्राथमिक उद्देश्य ब्रिटिश राज के तहत ‘फूट डालो और राज करो’ रहा है। साथ ही इसमें कहा गया है कि समावेश भारत की विरासत में निहित है। लेटर में इस बात का भी जिक्र है कि ‘इंडिया: द मोदी क्वेश्चन’ नाम की डॉक्यूमेंट्री बनाने की बजाय बीबीसी को पीएम मोदी के खिलाफ अपने स्वयं के पूर्वाग्रह पर सवाल उठाना चाहिए। साथ ही ‘बीबीसी: द एथिकल क्वेश्चन’ नाम की डॉक्यूमेंट्री बनानी चाहिए।

भारत ने दर्ज कराया था विरोध

भारत ने साल 2002 में हुए गुजरात में हुए दंगों पर बनी बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री को ‘दुष्प्रचार का एक हिस्सा’ करार दिया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था कि इसमें पूर्वाग्रह, निष्पक्षता की कमी है। साथ ही इसमें औपनिवेशिक मानसिकता स्पष्ट रूप से झलकती है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना था कि यह एक विशेष ‘गलत आख्यान’ को आगे बढ़ाने के लिए दुष्प्रचार का एक हिस्सा है। बागची का कहना था कि यह हमें इस कवायद के उद्देश्य और इसके पीछे के एजेंडा के बारे में सोचने पर मजबूर करता हैं।

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