भारतीय ज्ञान परम्परा को संरक्षित कर वर्तमान पीढ़ी से जोड़ना समय की आवश्यकता : मुख्यमंत्री
भारतीय ज्ञान परम्परा को शोध, संरक्षण और आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाने की आवश्यकता

PL NEWS लखनऊ : 24 सितम्बर, 2026 : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा अत्यन्त समृद्ध रही है। इसे संरक्षित करना, इसका अध्ययन करना और वर्तमान पीढ़ी को इससे परिचित कराना आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। अपनी जड़ों की ओर लौटकर अपनी परम्परा को वर्तमान के साथ जोड़ते हुए भारत की ज्ञान-धरोहर को लोकमंगल की भावना के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री जी आज श्री गोरखनाथ मंन्दिर, गोरखपुर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं तथा ब्रह्मलीन महन्त अवैद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित साप्ताहिक पुण्यतिथि समारोह-2026 के अवसर पर ‘भारतीय ज्ञान परम्परा का वर्तमान परिप्रेक्ष्य’ संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।
मुख्यमंत्री जी ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों ‘हम क्या थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी, आओ मिलकर सोचें ये समस्याएं सभी।’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के विद्वानों ने सदैव अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को लेकर चिन्तन किया है। चिन्तन की इसी परम्परा में भारतीय ऋषियों ने अपनी ज्ञान-धरोहर को विभिन्न माध्यमों से संरक्षित किया।
भारतीय ज्ञान परम्परा को सुरक्षित रखने, उसका संरक्षण करने और उसे आधुनिक परम्परा के साथ जोड़ने से आज भी बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है। भारत दुनिया को बहुत कुछ दे सकता है और लोकमंगल की कामना के साथ इस परम्परा को आगे बढ़ाया जा सकता है। इस दिशा में तीन बिन्दु महत्वपूर्ण होंगे। पहला, सत्य का पक्ष-हम जो भी कहें, उसे प्रमाणित करके कहें, तभी वह सत्य की कसौटी पर खरा उतरेगा। दूसरा, ऐसे लोग भी होंगे जो उसे असत्य ठहराने का प्रयास करेंगे, इसलिए प्रमाण महत्वपूर्ण होगा। तीसरा, दुष्प्रचार करने वाले लोग भी हमेशा रहे हैं। एक पक्ष सत्य का, एक असत्य का और एक संशय पैदा करने वाला पक्ष भी होता है। इस संशय को दूर करने के लिए भी स्वयं को तैयार करना होगा।
आज की तकनीक इस कार्य में बहुत सहायता कर सकती है। हम तकनीक से भाग नहीं सकते, बल्कि तकनीक को अपने अनुरूप और समयानुकूल बनाने की दिशा में प्रयास करना होगा। भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण, शोध और उसके व्यापक प्रसार के लिए एक व्यापक अभियान को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
भारतीय ज्ञान परम्परा को आज वैश्विक स्तर पर भी मान्यता मिल रही है। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत की परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों को आयुष मंत्रालय के माध्यम से संस्थागत मान्यता मिली। आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी जैसी परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों को आगे बढ़ाने का कार्य हुआ। भारत की योग परम्परा को भी वैश्विक स्तर पर मान्यता मिली। 21 जून की तिथि को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भारत की ज्ञान परम्परा को कमजोर करने के प्रयास भी इतिहास में हुए। विदेशी आक्रान्ताओं ने केवल भारत के वैभव को लूटने का प्रयास नहीं किया, बल्कि भारत की बुद्धि और ज्ञान की परम्परा को कमजोर एवं नष्ट करने के प्रयास भी किए। उन्होंने रामायण के दण्डकारण्य प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम जब दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं, तो ऋषि-मुनियों के उजड़े आश्रम और बाहर बिखरी हुई हड्डियां देखते हैं। ऋषियों ने बताया कि राक्षसी शक्तियां आश्रमों में घुसकर उन्हें उजाड़ती थीं और विरोध करने वाले ऋषि कुमारों की हत्या कर देती थीं। तब भगवान श्रीराम ने उन राक्षसी शक्तियों के नाश का संकल्प लिया और दण्डकारण्य में आगे बढ़ते हुए पंचवटी को अपना केन्द्र बनाया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि भारत पर आक्रमण करने वाली शक्तियों का उद्देश्य केवल भारत के वैभव को लूटना नहीं था, बल्कि भारत की बुद्धि और ज्ञान की धरोहर को भी कमजोर करना था। मन्दिरों को तोड़े जाने के पीछे भी यही उद्देश्य दिखाई देता है। उन्होंने सोमनाथ मन्दिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां के पुजारियों ने मन्दिर को न तोड़ने और भगवान सोमनाथ की मूर्ति को क्षतिग्रस्त न करने के बदले जितना सोना और जवाहरात चाहिए, देने की बात कही थी, लेकिन उसका उद्देश्य केवल लूटना नहीं था। उसने मन्दिर को क्षतिग्रस्त किया, भगवान सोमनाथ की मूर्ति को तोड़ा और लूटपाट करके वापस चला गया। अन्य आक्रान्ताओं ने भी भारत के साथ इसी प्रकार का व्यवहार किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि ब्रिटिश कालखण्ड में भी अलग प्रकार से भारत की परम्पराओं को कमजोर करने का प्रयास हुआ। संस्कृत भाषा की श्रेष्ठता के स्थान पर अंग्रेजी को श्रेष्ठ बताने, परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों और आयुर्वेद के स्थान पर आधुनिक चिकित्सा को स्थापित करने का प्रयास किया गया। हमारी अपनी परम्पराओं पर दूसरे नाम और लेबल लगाए गए। परिणामस्वरूप हम धीरे-धीरे अपनी परम्परा, मूल्यों और जड़ों से कटते गए।
वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा देशवासियों को भारत की ज्ञान परम्परा के संरक्षण और उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया गया। इसी क्रम में प्राचीन पाण्डुलिपियों, ताम्रपत्रों और चर्मपत्रों के संरक्षण की दिशा में कार्य प्रारम्भ हुआ। ज्ञान की जो धरोहर विभिन्न स्थानों पर बिखरी हुई थी और शिलालेखों, ताम्रपत्रों तथा पाण्डुलिपियों के रूप में उपलब्ध थी, उसके महत्व को आधुनिकता के मोह में कई परिवार और समाज के लोग समझ नहीं पा रहे थे। आज जब इसके संरक्षण, अध्ययन और शोध की दिशा में कार्य हो रहा है तो इसके महत्व को व्यापक रूप से समझा जा रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने काशी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का अनुभव साझा करते हुए कहा कि वहां शासन के सहयोग से प्राचीन पाण्डुलिपियोंं के संरक्षण एवं डिजिटाइजेशन का कार्य चल रहा है। वहां एक लाख से अधिक पाण्डुलिपियां संग्रहीत हैं। उनके संरक्षण का कार्य आगे बढ़ रहा है। यदि एक विश्वविद्यालय में यह कार्य हो रहा है, तो निश्चित रूप से देश और प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी यह कार्य हो रहा होगा। परिवारों, विद्वानों के घरों, समाज, प्राचीन मठों और मन्दिरों में भी ज्ञान की ऐसी अनेक धरोहरें बिखरी हुई हैं, जिन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है।
उत्तर प्रदेश में अयोध्या, प्रयागराज, मथुरा-वृन्दावन, लखनऊ सहित अनेक शहरों में पाण्डुलिपियां, ताम्रपत्र और शिलालेख बड़ी मात्रा में उपलब्ध हुए हैं। इनके माध्यम से उस कालखण्ड, उस समय प्रचलित लिपि, मुद्रा और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
दुनिया में सम्भवतः भारतीय समाज ही ऐसा है, जिसने ज्ञान को केवल अक्षर सीखने अथवा भौतिक उपलब्धियां प्राप्त करने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्रीधराचार्य जी महाराज द्वारा बताए गए सूत्र “सा विद्या या विमुक्तये” का उल्लेख करते हुए कहा कि विद्या वही है जो मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करे। भारतीय परम्परा में विद्या को परा विद्या और अपरा विद्या के रूप में समझा गया। भौतिक जगत की जानकारी एक प्रकार की विद्या कराती है, लेकिन इस भौतिक जगत के बाहर भी बहुत कुछ है। उस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करने के लिए भी माध्यम और मार्ग निर्धारित किया गया। जब दोनों विद्याओं का समन्वय करते हुए आगे बढ़ते हैं, तभी जीवन के उन लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है, जिनके लिए मनुष्य को जीवन प्राप्त हुआ है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि भारत में प्राचीन काल से ही अच्छी जलवायु, उर्वरा भूमि और पर्याप्त जल संसाधन रहे हैं, लेकिन दुनिया में भारत की वास्तविक पहचान उसकी ज्ञान परम्परा के कारण विश्वगुरु के रूप में रही। आज के विकसित देशों का इतिहास जहां लगभग चार-पांच सौ वर्षों का है, वहीं भारत के पास लगभग 2600 वर्ष पूर्व तक्षशिला जैसा विश्वविद्यालय था। लगभग 1700-1800 वर्ष पूर्व नालन्दा जैसा विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय था। काशी, उज्जैन, कांची और नैमिषारण्य जैसे केन्द्र भारत की ज्ञान-धरोहर की पवित्र नगरियों के रूप में प्रतिष्ठित थे।
कुम्भ का आयोजन केवल संगम में स्नान तक सीमित नहीं था। देश के महत्वपूर्ण केन्द्रों पर सन्त और विद्वान एकत्र होकर अपने-अपने नवाचार और शोध पर परस्पर चर्चा करते थे। कहां क्या नया हुआ है और किस दिशा में क्या प्रगति हुई है, इस पर चिन्तन किया जाता था। इसी ज्ञान परम्परा में प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन तथा नासिक-त्रयम्बकेश्वर में कुम्भ की परम्परा विकसित हुई।
औपनिवेशिक कालखण्ड में भारत ने अंग्रेजी तिथि को दैनिक एवं शासकीय कार्यों के लिए स्वीकार किया, लेकिन भारतीय समाज ने अपने पर्व-त्योहारों की परम्परा को अंग्रेजी तिथियों के अनुसार नहीं बदला। मकर संक्रान्ति से लेकर दीपावली और कार्तिक मास के विभिन्न आयोजनों तक हमारे पर्व और त्योहार भारतीय पंचांग और भारतीय तिथि के अनुसार ही निर्धारित होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज ने अपनी स्मृति-पटल पर अपनी ज्ञान-धरोहर को सुरक्षित रखा।
कार्यक्रम में चर्चा के दौरान आई0आई0टी0 बी0एच0यू0 के प्रोफेसर डॉ0 वी0 रामनाथन जी द्वारा काशी में उत्तरवाहिनी गंगा की पूजा का महत्व रेखांकित किये जाने का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री जी ने कहा कि गंगा का उत्तर की ओर प्रवाहित होना अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रतीक है। अपनी जड़ों की ओर देखने और मूल परम्परा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने की भावना भारत की सनातन परम्परा में रही है। आज हमें भी अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा, अपनी परम्परा को खोजना होगा और उसे वर्तमान के साथ जोड़ना होगा।
भाषा, व्याकरण, अर्थशास्त्र, विज्ञान, खगोल, ज्योतिष, आयुष, शिल्प और तकनीक सहित ऐसा कोई क्षेत्र नहीं था, जिसमें भारत का ज्ञान अद्भुत न रहा हो। प्राचीन विश्वविद्यालयों ने सभी क्षेत्रों में विद्वान तैयार किए। इस ज्ञान को जानने, सीखने, उससे प्रेरणा प्राप्त करने और उस पर गौरव की अनुभूति करने का अवसर वर्तमान पीढ़ी को मिलना चाहिए।
अपनी ऋषि परम्परा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने और भारत को भारतीयता का अनुभव कराने के लिए भारतीय ज्ञान परम्परा की शोध पीठों की स्थापना का कार्य फिर से प्रारम्भ हुआ है। भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़ी सभी धरोहरों के संरक्षण तथा वर्तमान पीढ़ी को उनसे अवगत कराने के लिए यह सबसे उपयुक्त समय है। इन प्रयासों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। यदि हम अपनी धरोहर का संरक्षण करते हैं तो हम अपने पूर्वजों के प्रति सही मायने में कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। यदि हम अपनी धरोहर से दूर होते हैं तो पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान की भावना को ईमानदारी से व्यक्त नहीं कर पाते।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि गोरक्षपीठ से जुड़े आचार्य ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज और ब्रह्मलीन महन्त अवैद्यनाथ जी महाराज के पुण्यतिथि कार्यक्रम में स्मृति व्याख्यानमाला के अन्तर्गत इन महत्वपूर्ण विषयों का चयन इसलिए किया गया है, ताकि सामान्य शिक्षा के साथ-साथ समाज अपने आपको पहचानने और अपनी जड़ों को ढूंढने का प्रयास करे। दुनिया को यह बताया जा सके कि भारत की ज्ञान-धरोहर अत्यन्त समृद्ध थी और वह केवल भाषा के क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि व्याकरण, विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र सहित अनेक क्षेत्रों में भारत ने महत्वपूर्ण ज्ञान विकसित किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि पाणिनि ने आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले तक्षशिला विश्वविद्यालय में अपना व्याकरण ग्रन्थ रचा था। दुर्भाग्य से उनकी जन्मभूमि आज पाकिस्तान में है, लेकिन हम उस गौरवपूर्ण परम्परा को भूल गए। हम पतंजलि, भारत के सिद्धों की परम्परा, आयुर्वेद के आचार्यों और चाणक्य के अर्थशास्त्र को भूल गए। नैमिषारण्य में लगभग 3,000 वर्ष पूर्व 88,000 ऋषियों की परम्परा ज्ञान की इस धरोहर को लिपिबद्ध करने के कार्य से जुड़ी थी। वहां विशाल संगोष्ठियां होती थीं और ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाया जाता था। उन्होंने कहा कि हम नैमिषारण्य को भी विस्मृत कर गए।
इस अवसर पर सन्तगण सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।



