उत्तर प्रदेशलखनऊ

हर्षोल्लास से मनाया गया श्रीगुरु हरिगोबिन्द साहिब का प्रकाश पर्व

  • आषाढ़ माह की महिमा भी बताई
  • गुरूद्वारा नाका में मनाया गया श्रीगुरु का प्रकाश पर्व

लखनऊ। मीरी पीरी के मालिक, बन्दी छोड़ दाता, सिखों के छठे गुरु श्री गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी का प्रकाश पर्व एवं आषाढ़ माह संक्रान्ति पर्व बुधवार को श्रद्धा व हर्षोल्लास से मनाया गया। इस अवसर पर भजन-कीर्तन एवं लंगर भी हुआ। काफी संख्या में श्रद्धालुओं ने गुरूद्वारों में माथा टेका। लखनऊ, नाका हिंडोला स्थित ऐतिहासिक गुरूद्वारा श्री गुरू नानक देव जी में रागी जत्था भाई राजिन्दर सिंह ने अपनी मधुरवाणी में कीर्तन गायन किया।

क्रोध की अग्नि प्रभु भक्ति से हो जाती है ठंडी

मुख्य ग्रन्थी ज्ञानी सुखदेव सिंह ने आषाढ़ माह के बारे में बताया कि आषाढ़ का महीना तपश से भरा हुआ होता है, इस माह में श्री गुरु अरजन देव जी के उपदेश द्वारा क्रोध की अग्नि नाम जपने व ध्यान करने से शान्त हो सकती है। प्रभु भक्ति एवं वाहिगुरु के नाम की ठंडक की वजह से ही श्री गुरु अरजन देव जी गरम तवी पर बैठकर भी मुस्कराते रहे और कहा कि हमारा हृदय नाम जपने से शान्त और ठंडक भरा है। हमें इसकी गर्मी महसूस नहीं होती।

अमृतसर में हुआ था गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी का जन्म

शाम का विशेष दीवान श्री रहिरास साहिब के पाठ से आरम्भ हुआ। ज्ञानी जी ने श्री गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी के जीवन के बारे में बताया कि गुरूजी का जन्म श्री गुरु अरजन देव जी व माता गंगा जी के घर श्री अमृतसर में हुआ था। श्री गुरु अरजन देव जी की शहीदी के बाद हरिगोबिन्द साहिब गद्दी पर बैठे।

उन्होंने दो तलवारें धारण की एक मीरी की और एक पीरी की। मीरी का मतलब बादशाहत, ताकत, शक्ति, भाव जो लोग दुनिया में जुल्म कर रहे है उन्हें मीरी की तलवार से जुल्म करने से रोकूंगा। पीरी का मतलब जो लोग पीर फकीर अधर्मी बनकर पाप कर रहे हैं, उनके पाप को प्रकट करुंगा व सच्चे धर्माथियों की रक्षा करुंगा।

अकाल तख्त की सर्जना की

जहां श्री गुरु अरजन देव जी ने अमृतसर में हरिमन्दिर साहिब की सर्जना की जो भक्ति का प्रतीक है, वहां श्री गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी ने हरिमन्दिर साहिब के ठीक सामने अकाल तख्त की सर्जना की जो शक्ति का प्रतीक है। गुरु जी ने दुनिया के भले के लिये पानी की कमी को देखकर जगह-जगह कुएं खुदवाये और ऊँच नीच के भेदभाव को खत्म किया।

…तो ‘बन्दी छोड़ दाता’ भी कहते हैं

गुरु जी की दिन प्रतिदिन बढ़ती ताकत को देखकर जुल्म का शिकार हुए ईष्यालू सहन न कर सके। गुरु जी को ग्वालियर के किले में बन्द कर दिया। जहां जहाँगीर के सताये हुए 52 हिन्दू राजा भी कैद थे जिनका राजपाट बादशाह ने अपने कब्जे में कर लिया था। कुछ समय बाद बादशाह ने गुरु जी को मुक्त करने का आदेश दिया। गुरु जी ने कहा हम अकेले किले से बाहर नहीं जायेंगे। अगर हमें रिहा करना है तो इन 52 हिन्दू राजाओं को भी रिहा करना होगा। जहाँगीर को गुरु जी की शर्त माननी पड़ी। इस तरह गुरु जी उन 52 हिन्दू राजाओं को लेकर किले से बाहर निकले और उनका राजपाट वापस दिलवाया। तभी से गुरु जी को ‘बन्दी छोड़ दाता’ भी कहा जाता है। कार्यक्रम का संचालन सतपाल सिंह मीत ने किया।

लखनऊ गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी एवं गुरूद्वारा के अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह बग्गा ने संगत को आषाढ़ माह संक्रान्ति पर्व एवं श्री गुरु हरिगोबिन्द साहिब जी के प्रकाश पर्व की बधाई दी। दोनों दीवानों की समाप्ति के पश्चात महामंत्री हरमिन्दर सिंह टीटू की देखरेख में दशमेश सेवा सोसाइटी के सदस्यों द्वारा पूड़ी-आलू, खीर, मिस्से प्रसादे एवं लस्सी का लंगर वितरित किया।

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