उत्तर प्रदेशलखनऊ

‘मोरे राम अवध घर आए..’ लोकगीत में नाचने लगे दर्शक

  • लोक गाायिका मालिनी अवस्थी ने दी ’रघुबीरा’ की प्रस्तुति, माहौल हुआ श्रीराम भक्ति से सराबोर
  • लोहिया पार्क में सोन चिरैया की ओर से आयोजित दो दिवसीय लोक उत्सव ’देशज’ हुआ सम्पन्न

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में चल रहे दो दिवसीय लोक सांस्कृतिक उत्सव ’देशज’ में दूसरे दिन रविवार को प्रसिद्ध लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने जब गीत ’मोरे राम अवध घर आए.. आगे आगे राम चले पीछे चले सेना… , गाया तो दर्शक दीर्धा में बैठे महिलाएं व युवक, बच्चे सभी आकर नाचने लगे। वातारण श्रीराम और हनुमान जी भक्ति से सराबोर हो गया। मानो सच में प्रभु घर आए हो और अयोध्या में खुशी छा गई हो।

लोक सांस्कृतिक संस्था सोन चिरैया की ओर से गोमती नगर के लोहिया पार्क में आयोजित उत्सव में उ.प्र. पर्यटन एवं संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव मुकेश कुमार मेश्राम, मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी, लोकनिर्मला सम्मान से विभूषित मंजम्मा जोगती सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। लोहिया पार्क के खुले मंच पर आयोजित उत्सव में हजारों की संख्या में लोग आए थे। लोग खड़े होकर भी उत्सव को देख रहे थे।

उत्सव के दूसरे व अंतिम दिन रविवार को लोक गायिका मालिनी ने अपना अपनी प्रिय प्रस्तुति ’रघुबीर’ दी, जिसमें उन्होंने श्रीराम के जन्म से लेकर रावध वध के दृश्यों को अपनी श्रीराम चरित् मानस की चौपाइयों व गीतों के जरिए बड़ी खूबसूरती से अभिनय के साथ प्रस्तुत किया। ’रघुबीरा’ में सिया-राम के विवाह के प्रसंग में गायिका ने दर्शक दीर्घा में बैठे अपने पति अवनीश जी के गले में वरमाला पहना दी, जिसका लोगों ने तालियां बजाकर स्वागत किया। उनकी प्रस्तुति से गदगद होकर कर्नाटक से आई लोक कलाकार पद्मश्री मंजम्मा जोगती ने मालिनी जी व उनके पति अवनीश अवस्थी को साथ खड़ा करके अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी परम्परा से नजर उतारी और उनके जीवन के लिए शुभकामनाएं दी। उत्तरी कर्नाटक से लाई साड़ी भी भेंट की और कहा कि वह अभी 16 साल की लगती हैं। इसके अलावा उन्होंने यहां के लोक कलाकारों को कर्नाटक आने न्यौता भी दिया।

इससे पहले, कार्यक्रम की शुरुआत अवध का लोक नृत्य ढेढिया से हुई। इसमें नृत्यागंनाएं सिर पर छेददार कलश रखकर और उस पर दीया जलाकर नृत्य कर रहीं है। नृत्यांगनाएं अपनी चटक रंगों में परम्परागत पहनावा लहंगा-चोली व सिर पर चुनरी ओढ़कर नृत्य कर रही थीं। इनके साथ आई प्रशिक्षिका बीना सिंह ने बताया कि भगवान राम जब लंका विजय के बाद वापस आए थे, गंगा के तट पर बसे श्रृंगवेरपुर के वासी उनकी बाट जो रहे थे, जब प्रभु आए तो महिलाओं ने छेददार कलश सिर पर रखकर उसमें दीप जलाकर नृत्य किया था। इसी को ही ढेढिया नृत्य कहते हैं।

वहीं पंश्चिमी बंगाल से आए लोक कलाकारों ने उत्सव में छऊ नृत्य पेश किया। इसमेें कलाकार विशेष रूप से बनाया हुआ बड़ा सा मुखौटा पहन कर रामायण के प्रसंगों को नृत्य में दिखाया। पहले दिन जहां ’सीता स्वयंवर’ के प्रसंग को दिखाया वहीं दूसरे दिन ’रावण वध’ को दर्शाया। इनके दल में 17 कलाकार है। दल प्रमुख शशिधर आचार्य के भाई ने बताया कि इस नृत्य में एक कलाकार मुखौटा सहित लगभग 12-13 किलों का अतिरिक्त भार उठाकर नृत्य करता पंजाब से आए लोक कलाकारों ने भागड़ा नृत्य पेशकर अपने प्रदेश की संस्कृति को दर्शाया। वे सब अपनी परम्परागत पोशाक कढ़ा हुआ कुर्ता चादर, सदरी और सिर पर पगड़ी और गले कंठी पहने हुए थे। दलप्रमुख रवि कोनर ने बताया कि यह वैसे तो हर खुशी के मौके पर किया जाता है, लेकिन अप्रैल में वैशाखी के त्योहार पर खूब किया जाता है। जब फसल पक कर तैयार हो जाती है, तब अपनी फसल को देखकर किसान बहुत खुश होता है और परिवार के लोक भगडा डाल देते हैं। आई है वैशाखी नाल, खुशियां ले आई है, जट उड़ता फिरै ,ढोल बजादा फिरै, जट नच नच ले…. पर भांगड़ा किया तो लोगों ने खुशी से तालियां बजाई। इसके अलावा अवध में गाए जाने वाले आल्हा की प्रस्तुति भी हुई। दल का नेतृत्व जितेंद्र चौरसिया ने किया। इसके अलावा मणिपुर का थांगटा, पुुगचोलम, हरियाणा का धमाल सहित अन्य प्रस्तुत किए।

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