उत्तर प्रदेशवाराणसी

काशी में 21 अप्रैल से पांच दिन तक बिखरेगी ठुमरी की ठसक

  • -प्रसिद्ध ठुमरी गायिका बागेश्वरी देवी की याद में होगा महोत्सव, जुटेंगे ठुमरी के दिग्गज
  • -कई घरानों के गायन, वादन और नृत्य का होगा एक अद्भुत समारोह
  • -दो दिन की कार्यशाला में बच्चां को ठुमरी से परिचित कराएंगी पद्मश्री डा. सोमा घोष

वाराणसी। देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी अपनी खास गायन शैली ‘ठुमरी’ की ठसक एक बार फिर बिखेरने जा रही है। प्रसिद्ध गायिका रहीं बागेश्वरी देवी की याद में यहां 21 अप्रैल से पांच दिवसीय ठुमरी महोत्सव होने जा रहा है, जिसमें कई घरानों के दिग्गजों का जमावड़ा होगा। इस दौरान दो दिन की एक कार्यशाला में बच्चों को भी ठुमरी से परिचित कराया जाएगा।

महोत्सव की आयोजिका और भारतीय शास्त्रीय संगीत की ध्वजवाहिका पद्मश्री डा. सोमा घोष ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि इस आयोजन में देश और दुनिया भर के संगीत साधक गायन, वादन और नृत्य में ठुमरी को मुखर करेंगे। ठुमरी शैली के लिए प्रसिद्ध तीन घराने-पटियाला, बनारस और लखनऊ के अलावा आगरा और किराना घराना के दिग्गज भी इस महोत्सव में अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

उन्होंने बताया कि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से आयोजित हो रहा यह महोत्सव काशी में तीन स्थानों पर होगा। प्रथम दो दिन का आयोजन ठुमरी के तीर्थ स्थल के रुप में प्रसिद्ध महमूरगंज स्थित रमन निवास में होगा। वहीं 23 अप्रैल की प्रस्तुतियां बनारस क्लब में आयोजित होंगी और अंतिम दो दिन यानि 24 और 25 अप्रैल को सनबीम स्कूल में कार्यशाला होगी, जहां नई पीढ़ी के बच्चों को ठुमरी गायन शैली से परिचित कराया जाएगा।

ठुमरी संवेदनशील गायकी है

डा. सोमा घोष ने बताया कि ‘ठुमरी’ उत्तर भारत की सब से लोकप्रिय गायन शैली है और बनारस ठुमरी गायन के लिए दुनिया भर में सुप्रसिद्ध है। उन्होंने कहा, “ठुमरी संवेदनशील गायकी है, इसमें गायिका को नायिका बनना पड़ता है। ठुमरी कभी बेचैनी, कभी इंतजार कभी विनती तो कभी नायिका का शर्माना दर्शाती है।“ रस और भाव का प्रधान्य, ठुमरी की विशेषता है।

उन्होंने बताया कि ठुमरी गायन 19 वीं सदी में, वाजिद अली शाह के दरबार से शुरू हुआ। इस गायन शैली में, शब्दों और उसके भाव पर विशेष ध्यान दिया जाता है। “ठुमक“ से ठुमरी का सीधा संबंध साफ जाहिर है, क्योंकि इस गायन में नृत्य का शुरूसे ही प्रचलन रहा। ठुमरी तीन घरानों में विशेष रूप से सिखाई गई, पटियाला, बनारस और लखनऊ घराने प्रधान है। यद्यपि आगरा और किराना घराना में दो दिग्गज नाम आते है, उस्ताद अब्दुल करीम खां और उस्ताद फैयाज़ खान साहब का।

डा. सोमा के अनुसार अंग्रजों के समय से, ठुमरी के कई सुप्रसिद्ध गायक रहें। बनारस के दिग्गज ठुमरी गायिकाओं में, बड़ी मोती बाई, छोटी मोती बाई, रसुलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, बेगम अख्तर, गिरिजा देवी और बागेश्वरी देवी का नाम संगीत के इतिहास के पन्नो में दर्ज है। लखनऊ घराने के ठुमरी गायन को बिंदादिन महाराज ने सुप्रसिद्ध किया और आगे पंडित बिरजू महाराज ने। वहीं ठुमरी में पटियाला घराना का नाम रौशन करने का श्रेय उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब को जाता है।

बागेश्वरी देवी की शिष्या हैं सोमा घोष

गौरतलब है कि पद्मश्री डा. सोमा घोष प्रसिद्ध ठुमरी गायिका बागेश्वरी देवी की शिष्या हैं। सोमा घोष ने बागेश्वरी देवी की याद में पहला ठुमरी महोत्सव उनके निधन के एक साल बाद 2001 में मुम्बई में कराया था। करीब 22 वर्ष बाद यह महोत्सव अब काशी में होने जा रहा है। सोमा घोष के पति और प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शुभांकर घोष कहते हैं कि बागेश्वरी देवी काशी की जानी मानी गायिका रहीं लेकिन निधन के बाद उन्हें उपयुक्त सम्मान नहीं मिल सका। डा. सोमा उनकी एकमात्र शिष्या हैं। ऐसे में यह पांच दिवसीय महोत्सव बागेश्वरी देवी के लिए एक श्रद्धांजलि समारोह है।

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