ओपिनियन

राष्ट्रभाव से प्रेरित पत्रकारिता

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री


मीडिया का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक के साथ अब सोशल मीडिया की भी बाढ़ है। लेकिन यह सब तभी तक सार्थक है, जब तक इनके सामाजिक सरोकार भी है। इसके निर्वाह के लिए भारतीय संस्कृति के प्रति आग्रह आवश्यक है। भारत में देवर्षि नारद ने ही पत्रकारिता का प्रादुर्भाव किया था। उनके चौरासी सूत्र आधुनिक पत्रकारिता के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं। उनकी सभी बात आज की मीडिया पर न केवल लागू होती है, बल्कि उनपर अमल से मीडिया को आदर्श रूप दिया जा सकता है। लेकिन आधुनिक वामपंथी खेमे पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति की घोर अवहेलना की। उदारीकरण और वैश्वीकरण ने नया संकट पैदा किया है। ऐसे में राष्ट्रवादी पत्रकारिता के महत्व को बनाये रखने की चुनौती है। इसमें धीरे धीरे सफलता भी मिल रही है।

देश इस समय आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। यह संयोग है कि इस दौरान राष्ट्रवादी विचार से प्रेरित अनेक संगठन व संस्थान भी अपना अमृत वर्ष मना रहे हैं। कुछ दिन पहले विद्यार्थी परिषद द्वारा अपनी स्थापना के सात दशक होने पर ध्येय यात्रा पुस्तक का लोकार्पण नई दिल्ली में किया गया। इधर लखनऊ में हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद एजेंसी ने अमृत पर्व प्रवेश समारंभ-2022 का आयोजन किया। इसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य सुरेश जोशी भैयाजी, संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर सहित बड़ी संख्या में पत्रकार व अन्य लोग सहभागी हुए।

योगी आदित्यनाथ ने हिन्दुस्थान समाचार के संस्थापक बाबा साहेब आप्टे, एजेंसी को नई उंचाइयों पर ले जाने वाले बालेश्वर अग्रवाल और एजेंसी को दोबारा प्रारंभ करने वाले श्रीकांत जोशी का आदरपूर्वक स्मरण किया। कहा कि उन्हें भी हिन्दुस्थान समाचार की पत्रिकाओं नवोत्थान और युगवार्ता से जुड़ने का अवसर मिला है। राष्ट्र भाव की पत्रकारिता के अनुरूप कार्य करते हुए हिन्दुस्थान समाचार ने यह यात्रा तय की है। वह अब अपने अमृत काल में प्रवेश कर रहा है।

उन्होंने आशा व्यक्त की कि आने वाले समय में भी न्यूज एजेंसी भविष्य की चुनौतियों का समाना करते हुए लोगों तक गुणवत्तापूर्ण समाचार पहुंचाती रहेगी। हिन्दुस्थान समाचार ने आजादी के बाद भारतीयता को विशेष महत्व देते हुए सत्य, संवाद और सेवा को अपना ध्येय माना। वर्तमान समय में पत्रकारिता कई चुनौतियों का समाना कर रही है। प्रिंट, विजुअल और डिजिटल मीडिया के साथ ही लोगों का दृष्टिकोण बदला है। योगी आदित्यनाथ ने विश्वास व्यक्त किया कि है इन चुनौतियों का सामना करते हुए हिन्दुस्थान समाचार आगे बढ़ेगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश जोशी भैयाजी जोशी ने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में पचहत्तर वर्ष पूर्ण करना आसान नहीं है। पत्रकारिता को धर्म मानकर काम करने वाले ही सफल होते है। हिन्दुस्थान समाचार ने इसी विचार के अनुरूप कार्य किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आदर्श अपेक्षित हैं। उनके पालन से ही समाज व राष्ट्र का हित सुनिश्चित होता है। इन आदर्शों की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। समाचार सम्प्रेषण में स्पष्टता व गुणवत्ता रहनी चाहिए। इससे प्रामाणिकता कायम होती है। साथ ही समाज का भी कल्याण होता है। उसी के आधार पर देश का लोकतंत्र स्वस्थ बना रहेगा। देश के लोकतंत्र का स्वस्थ बने रहना समग्र विकास के लिए आवश्यक शर्त है। समाज जागरूक होकर सही दिशा में चलता है तभी लोकतंत्र सफल होता है। हिन्दुस्थान समाचार अपने स्थापना के समय से ही लेकर आज तक इसी धारणा से कार्य कर रहा है। आज ऐसी ही ध्येयवादी पत्रकारिता की आवश्यकता है।

संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर ने कहा कि हिन्दुस्थान समाचार ने देश की आजादी के बाद भारतीय भाषाओं में समाचार देने में बड़ी भूमिका निभाई थी। एक एजेंसी की सबसे बड़ी भूमिका यथास्थिति और स्पष्ट तथा पुष्ट जानकारी देना होता है। आज के समय में यह भूमिका और भी अधिक बड़ी हो जाती है। हिन्दुस्थान समाचार को आने वाले समय में भारत का सटीक और सही चित्रण विश्व पटल में रखने की बड़ी भूमिका निभानी होगी।

वस्तुतः भारतीय पत्रकारिता का वामपंथी विचारों ने नुकसान किया है। इसके लिए वामपंथियों ने अपना स्वरूप भी बदला है। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार समाज की व्याख्या की थी। उसने समाज को दो वर्गों में बांटा था। पहला पूंजीपति और दूसरा सर्वहारा। पूंजीपति सदैव सर्वहारा का शोषण करता है। दोनों में संघर्ष चलता रहता है। यह वामपंथियों, मार्क्सवादियों, माओवादियों, नक्सलियों का मूल चिंतन रहा है। इसमें अनेक बदलाव भी होते रहे। भारत के वामपंथियों ने मीडिया में अपना सांस्कृतिक विचार चलाया है। इसमें मार्क्स का आर्थिक चिंतन बहुत पीछे छूट गया। पूंजीपति और सर्वहारा की बात बन्द हो गई। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों की बात करना शुरू कर दिया। लेकिन वर्ग संघर्ष के चिंतन को बनाये रखा। ये कथित प्रगतिशील पत्रकार हिन्दू और मुसलमानों के संघर्ष की रचना करने लगे। इन्होंने यह मान लिया इनका वर्ग संघर्ष चलता रहेगा।

वामपंथी रुझान वाले यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सवर्ण और दलित के बीच भी वर्ग को हवा देना शुरू किया। वामपंथी रूझान की पत्रकारिता ने हिंदुओं के विरोध को अपना पैशन बना लिया। वर्ग संघर्ष के सिद्धांत पर उन्होंने यह विचार फैलाया की हिन्दू शोषक और मुसलमान शोषित है। इसीलिए पश्चिम बंगाल और केरल की राजनीतिक हिंसा उन्हें दिखाई नहीं देती। किंतु कुछ लोग मजहब के आधार पर समाज विरोधी कार्य करें, यह कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करें, तो इसे भगवा आतंकवाद के रूप में प्रसारित किया जाता है।

स्वतंत्रता के बाद से ही वामपंथी विचारकों को लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया। उनके द्वारा बनाये गए पाठ्यक्रम को शिक्षा में चलाया गया। इसमें भारत के प्रति हीन भावना का विचार था। प्राचीन भारतीय विरासत को खारिज किया गया। यह पढ़ाया गया कि विदेशी शासन ने भारत को सभ्य बनाया। जबकि वह स्वयं सभ्यताओं के संघर्ष करने वाले लोग थे। भारत तो सबके कल्याण की कामना करने वाला देश रहा है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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