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आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर भारत की अंतरिक्ष में लंबी छलांग

मृत्युंजय दीक्षित


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के नेतृत्व में अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत लगातार प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की ऐतिहासिक यात्रा 1962 में डा.विक्रम साराभाई के नेतृत्व में गठित भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति की स्थापना के साथ आरम्भ हुई । भारत के पहले साउंडिंग रॉकेट का प्रक्षेपण 1963 में केरल के थुंबा से हुआ था। इसरो के वर्तमान स्वरूप की स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई ओर इसरो का प्रथम उपग्रह आर्यभट्ट 1975 में यूएसएसआर से प्रक्षेपित किया गया। इसरो का प्रथम स्वदेशी उपग्रह एसएलवी -3 था जिसने 1980 में रोहिणी उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया। इसरो अपनी सफलता की यात्रा में अब तक 99 लांचिंग कर चुका है और कई कीर्तिमान स्थापित किये हैं। योजनानुसार आगे बढ़ते हुए इसरो वर्ष 2025 तथा आगे आने वाले वर्ष में वह करिश्मा करने जा रहा है जिससे पूरा भारत एक बार फिर गर्व का अनुभव करेगा।

आरंभिक दिनों में धनी तथा वैज्ञानिक दृष्टि से आगे माने जाने वाले देशों द्वारा उपहास बनाए जाने, साईकिल व बैल गाड़ी पर लादकर रॉकेट के पुर्जे ले जाने, गरीबी के कारण अंतरिक्ष अनुसंधान पर खर्च को लेकर सवाल उठने के बाद भी भारतीय वैज्ञानिक कभी निराश नहीं हुए वह कठिन दौर अब बहुत पीछे छूट चुका है, आज चन्द्रमा पर शिव शक्ति बिंदु के रूप में तिरंगा फहरा रहा है । इसरो के वैज्ञानिकों की अडिग प्रतिबद्धता और दृढ़ता कभी डिगी नहीं, नवाचार, परिश्रम और राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पण से उन्होंने संघर्षों को सफलता की गाथा में बदल दिया।
भारत के वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि संकल्प और दृष्टि के, साहसिक सपने साकार किए जा सकते हैं। इसरो ने वर्ष 2014 में प्रथम प्रयास में, सबसे कम लागत में मंगलयान मिशन को सफलतापूर्वक लांच किया। चंद्रयान -1 ने चन्द्रमा पर जल अणुओं की खोज की और वर्ष 2023 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतपूर्वक लैंडिंग की जिसे पूरे विश्व ने टीवी पर लाइव देखा, आज लैंडिंग का यह बिंदु शिवशक्ति बिंदु के नाम से जाना जाता है।

इसरो ने 2024 के आरम्भ में सूर्य का अध्ययन करने के लिए आदित्य एल- 1 का सफलतातपूर्वक प्रक्षेपण किया तथा अंत में स्पैडैक्स मिशन के साथ श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 44.5 मीटर लंबे ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएल वी – सी 60) रॉकेट ने दो छोटे अंतरिक्ष यानों चेजर और टारगेट के साथ सफलतापूर्वक छोड़ा है। अब चेजर और टारगेट को 475 किमीटर की वृत्ताकार कक्षा में स्थापित कर दिया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार आगामी 7 जनवरी तक डॉकिंग प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी। स्पैडेक्स मिशन के साथ ही अब भारत डॉकिंग और अनडॉकिंग क्षमता प्रदर्शित करने वाला चौथा देश बनेगा। इस समय दुनिया के मात्र तीन देश अमेरिका , चीन और रूस के पास अंतरिक्ष यान को अंतरिक्ष में डॉक करने की क्षमता है।अंतरिक्ष यान से दूसरे अंतरिक्ष यान के जुड़ने को डॉकिंग और अंतरिक्ष यानों के अलग होने को अनडॉकिंग कहते हैं।

स्पैडेक्स मिशन भारत के लिए कई दृष्टियों से बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भविष्य के मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए महत्वपूर्ण तकनीक है।यह अतंरिक्ष में डॉकिंग के लिए बहुत ही किफायती प्रौद्योगिकी मिशन है। इसकी सफलता चंद्रमा पर मानव को भेजने व नमूने लाने के लिए जरूरी है।इसकी सफलता से भविष्य में भारत के वैज्ञानिक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण और संचालन में भी आत्मनिर्भर होंगे क्योकि इसरो की 2035 तक अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजना है। वही एक से अधिक रॉकेट लांच करने के लिए भी इस तकनीक की जरूरत है।

यह अंतरिक्षयान दो वर्षों तक पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे।दोनों अंतरिक्ष यानों का वजन 220 किग्रा है।इस मिशन की सफलता से अंतरिक्ष कचरे की समस्या से निपटने में भी सफलता मिलेगी। पीओईएम इसरो का प्रायोगिक मिशन है इसके तहत कक्षीय प्लेटफार्म के रूप में पीएस 4 चरण का उपयोग करके कक्षा में वैज्ञानिक प्रयोग किया जाता है।पीएसलवी -चार चरणों वाला रॉकेट है इसके पहले तीन चरण प्रयोग होने के बाद समुद्र में गिर जाते हैं और अंतिम चरण उपग्रह को कक्षा में प्रक्षेपित करने के बाद अतंरिक्ष में कबाड़ बन जाता है। पीओईएम के तहत रॉकेट के इसी चौथे चरण का इस्तेमाल वैज्ञानिक प्रयोग करने में किया जायेगा।
वर्ष 2025 में और कमाल करेगा इसरो – अंतरिक्ष क्षेत्र के विशेषज्ञों का मत है कि अभी तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने जो कुछ किया है वह तो ट्रेलर मात्र है आगामी कुछ वर्षों में इसरो के वैज्ञानिक और भी कमाल करने की तैयारी कर रहे हैं और जिसके बाद भारत का अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जायेगा। इस वर्ष इसरो की 36 सेउपग्रहों का प्रक्षेपण करने की योजना तो है ही साथ ही रूस और अमेरिका के साथ मिलकर अंतरिक्ष यात्री भेजने की तैयारी भी है। लो अर्थ ऑर्बिट में कुल 36 सेटेलाइट लांच होने जा रहे हैं। जो देश के कई सेक्टरों को लाभान्वित करेंगे।इससे कृषि, संचार और परिवहन जैसे क्षेत्रों का सुविधा मिलेगी और आम जनजीवन में सुधार होगा।

नये वर्ष में अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की तैयारियों में प्रमुख है कि इसरो ने निजी कंपनियों को प्रक्षेपण यान के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरित करने का निर्णय लिया है। इससे भारत में प्रक्षेपण यान का एक बड़ा बाजार तैयार होने जा रहा है। इसमें एएसएलवी एक नई शक्ति के रूप में स्थापित होगा। चंद्रयान-3 और आदित्य एल -1 के बाद स्पैडेक्स मिशन की सफलता पर केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत अब स्वदेशी डॉकिंग सिस्टम विकसित करने वाला विश्व का चौथा देश बन गया है। इसरो का यह मिशन अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक नये युग का आरम्भ है। स्पैडेक्स मिशन छोटे अंतरिक्ष यानों के साथ पहला ऐसा मिशन है। हम इसे बड़े अंतरिक्ष यानों के साथ आगे बढ़ायेंगे। मंत्री का कहना है कि नये साल में इसरो नासा सिथेंटिक एपर्चर रडार उपग्रह लांच करने के लिए तैयार है। भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान के तहत व्योममित्र रोबोट को भी इस वर्ष लांच करने की तैयारी की है। मार्च से पहले गगनयान मिशन के लिए क्रू एस्केप सिस्टम के परीक्षण की भी योजना है। 2025 के मध्य या 2026 के प्रारम्भ में ही हमारी मानव अंतरिक्ष उड़ान -गगनयान को लांच किया जायेगा। गगनयान मिशन के तहत अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किमी कक्षा में भेजा जायेगा और उन्हें भारतीय समुद्री क्षेत्र में उतारा जायेगा। जनवरी 2025 में ही जीएसएलवी मिशन के साथ 100वीं लांचिंग भी होने जा रही है। कुल मिला कर आने वाला समय भारत के सूर्य के अन्तरिक्ष में उदय होने का है।

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