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‘हिंसक आंदोलन किसी नतीजे तक नहीं पहुंचते’, RSS प्रमुख ने दशहरा पर संबोधन में Gen-Z का किया जिक्र

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को आरएसएस की वार्षिक विजयादशमी रैली को संबोधित करते हुए जहां  पहलगाम हमले के बाद भारत का रुख, ट्रंप के टैरिफ समेत कई ज्वलंत मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित किया, इसके साथ ही उन्होंने पड़ोसी देशों में हुए हिंसक विद्रोहों का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे विद्रोह किसी नतीजे तक नहीं पहुंचते हैं। ये विरोध प्रदर्शन “विदेशी शक्तियों को दखलंदाज़ी का मौका देते हैं”।

उथल-पुथल से किसी का लाभ नहीं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100वीं शताब्दी पर नागपुर में शस्त्र पूजा के बाद अपने संबोधन में उन्होंने कहा -जनता में असंतोष को इस प्रकार व्यक्त करना किसी के लाभ में नहीं होता, उथलपुथल से किसी क्रांति से अपने उत्कृष्ट को प्राप्त नहीं किया। हमारे पड़ोसी देश में उथल पुथल हो रही, कुछ साल पहले तक ये सब हमारे अपने देश थे,ये सब हमारे अपने है, इसलिए चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा, “पड़ोस में अशांति कोई अच्छा संकेत नहीं है… श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में जनाक्रोश के हिंसक विस्फोट के कारण सत्ता परिवर्तन हमारे लिए चिंता का विषय है। भारत में ऐसी अशांति पैदा करने की चाह रखने वाली ताकतें हमारे देश के अंदर और बाहर दोनों जगह सक्रिय हैं।”

बदलाव लोकतांत्रिक तरीके से भी आता है-भागवत

उन्होंने कहा, “जब सरकार जनता से दूर रहती है, उनकी समस्याओं से पूरी तरह अनभिज्ञ रहती है, और नीतियां उनके हित में नहीं होतीं, तो जनता सरकार के खिलाफ हो जाती है। लेकिन अपनी नाखुशी जाहिर करने के लिए इस तरह का इस्तेमाल करने से किसी को कोई फायदा नहीं होता। परिवर्तन लोकतांत्रिक तरीकों से भी आता है। परिवर्तन लापरवाह या हिंसक तरीकों से नहीं होता; ऐसे प्रयास उथल-पुथल पैदा करते हैं, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रहती है।”

भागवत ने यह भी कहा, “किसी उथल-पुथल से पैदा हुई कोई भी क्रांति अपने लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाई हैऔर विश्व इतिहास में हुई क्रांतियों का ज़िक्र किया। इतिहास देखिए। किसी भी क्रांति ने अपना उद्देश्य पूरा नहीं किया है। फ्रांस अपने राजा के खिलाफ उठ खड़ा हुआ और नेपोलियन सम्राट बन गया। कई तथाकथित समाजवादी आंदोलन हुए, लेकिन अब ये सभी समाजवादी देश पूंजीवादी हो गए हैं।” आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विविधता भारत की परंपरा है और हमें अपनी विविधताओं को स्वीकार करना चाहिए।

पहलगाम हमले के बाद पता चला कौन अपना मित्र है-भागवत

पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद विभिन्न देशों द्वारा अपनाए गए रुख से भारत के साथ उनकी मित्रता के स्वरूप और प्रगाढ़ता का पता चला। वह आरएसएस की वार्षिक विजयादशमी रैली को संबोधित कर रहे थे। यह रैली ऐसे समय में हुई जब आरएसएस अपना शताब्दी वर्ष भी मना रहा है। आरएसएस की स्थापना 1925 में दशहरा (27 सितंबर) के दिन नागपुर में महाराष्ट्र के एक चिकित्सक केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी।

मोहन भागवत ने कहा, ‘‘हमारे दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध हैं और आगे भी बनाए रखेंगे, लेकिन जब बात हमारी सुरक्षा की आती है तो हमें ज़्यादा सावधान, ज़्यादा सतर्क और मजबूत होने की जरूरत है। पहलगाम हमले के बाद विभिन्न देशों के रुख से यह भी पता चला कि उनमें से कौन हमारे मित्र हैं और किस हद तक।’’ उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का हवाला देते हुए कहा कि आतंकवादियों ने सीमा पार कर जम्मू कश्मीर के पहलगाम में धर्म पूछकर 26 भारतीयों की हत्या कर दी, जिस पर भारत ने कड़ा जवाब दिया।

संघ प्रमुख ने कहा, ‘‘इस हमले से देश में भारी पीड़ा और आक्रोश फैला। हमारी सरकार ने पूरी तैयारी की और इसका कड़ा जवाब दिया। इसके बाद नेतृत्व का दृढ़ संकल्प, हमारे सशस्त्र बलों का पराक्रम और समाज की एकता स्पष्ट रूप से दिखाई दी।’’ उन्होंने कहा कि चरमपंथी तत्वों को सरकार की ओर से कार्रवाई का सामना करना पड़ा है, जबकि समाज ने भी उनके ‘‘खोखलेपन’’ को पहचानकर उनसे दूरी बना ली है। उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें (चरमपंथियों को) नियंत्रित किया जाएगा। उस क्षेत्र में एक बड़ी बाधा अब दूर हो गई है।’’

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