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गीता प्रेस के संस्थापक – हनुमान प्रसाद पोद्दार जी

सनातन धर्म सम्बन्धी पुस्तकों की बात करें तो जो सबसे पहला नाम ध्यान में आता है वो गीता प्रेस का होता है। गीता प्रेस के नाम के साथ ही जिस महामानव का नाम धयन में आता है वे हैं गीता प्रेस के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार जी। हनुमान प्रसाद जी का जन्म ही संभवतः इस युग में सनातन साहित्य का हनुमान बनने के लिए हुआ था।

राजस्थान के रतनगढ़ की माता रिखी बाई के पुत्र लाला भीमराज अग्रवाल अपनी माता की तरह ही हनुमान भक्त थे तो जब उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी तो उन्होंने उसका नामकरण हनुमान प्रसाद किया। हनुमान प्रसाद जी मात्र दो वर्ष के ही थे जब इनकी माता का स्वर्गवास हो गया अतः स्वाभाविक रूप से इनका पालन पोषण अपनी हनुमान भक्त दादी के संरक्षण में हुआ।

दादी के धार्मिक संस्कारों के बीच बालक हनुमान को बचपन से ही गीता, रामायण, वेद, उपनिषद और पुराणों की कहानियां पढ़ने – सुनने को मिलीं। इन धार्मिक संस्कारों का बालक हनुमान पर गहरा प्रभाव हुआ। बाल्यावस्था से ही इन्हें “हनुमान कवच“ का पाठ सिखाया गया। निंबार्क संप्रदाय के संत ब्रजदास जी ने बालक हनुमान को दीक्षा दी।

भारतीय संस्कृति की सेवा करते हुए भारत के समृद्ध ग्रंथों एवं परंपराओं की व्याख्या कर गीताप्रेस के माध्यम से उनको जन -जन तक पहुंचाने का कार्य करने वाले हनुमान प्रसाद पोद्दार जी, जीवन के कुछ समय तक क्रांतिकारी भी रहे और अंग्रेजों के विरुद्ध सशत्र संघर्ष का हिस्सा रहे। पोद्दार जी ने मात्र 13 वर्ष की अवस्था में ही बंग भंग आंदोलन से प्रभावित होकर स्वदेशी का व्रत ले लिया था। 1914 में महामना मदन मोहन मालवीय के साथ संपर्क में आने के बाद पोद्दार जी हिंदू महासभा में सक्रिय हो गये।

पारिवारिक व्यवसाय के कारण हनुमान प्रसाद अपने पिताजी के साथ कोलकाता में रहे और वहां अरविंद घोष, देशबंधु चितरंजन दास,पंडित झाबर लाल शर्मा जैसे महान क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। वीर सावरकर के द्वारा लिखी गई पुस्तक 1857 का स्वातंत्र्य समर ग्रंथ से वे बहुत प्रभावित हुए और 1938 में वीर सावरकर से मिलने मुंबई चले गये। उनके विचारों से प्रभावित पोद्दार जी ने भारतीय संस्कृति साहित्य, पुराणों और आध्यात्मिक ज्ञान को संरक्षित करने में महती भूमिका निभाई।

पोद्दार जी में देशभक्ति की भावना बहुत प्रबल थी। एक बार की बात है कि वह कलेक्टर कार्यालय में अंग्रेज गवर्नर का आदेश पत्र पढ़ रहे थे। कलेक्टर ने उन्हें एक कागज पर हस्ताक्षर करने का आदेश देते हुए कहा अपको इस इकरार नामे पर हस्ताक्षर करने होंगे कि आप आजीवन राजनीति में भाग नहीं लेंगे।“ तब हनुमान प्रसाद जी ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहाकि ,“मैं इस इकरारनामे पर हस्ताक्षर नहीं कर सकता हूं”। बाहर आकर उन्होंने अपने सहयोगी भाई हरिबख्श जी से कहा कि, “मैं राजनीति में भाग लूं या नहीं,यह निर्णय लेने का अधिकार मेरा होना चाहिए न कि विदेशी सरकार का अतः मैंने उस आदेश पर हस्ताक्षर नहीं किए।“

हिंदू धर्मग्रंथों में त्रुटियों को देखकर उन्हें बहुत कष्ट होता था।उन्होंने तुलसीकृत श्री रामचरित मानस की जितनी हस्तलिखित प्रतियां मिल सकीं एकत्र की और विद्वानों को बिठाकर मानस पीयूष नामक उनका शुद्ध पाठ भावार्थ एवं टीकाएं तैयार करायीं। श्रीमद्भागवत गीता के अनन्य भक्त व प्रचारक जयदयाल गोयनका और हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने 1923 में गीता प्रेस की स्थापना की। गीताप्रेस की स्थापना के साथ ही उन्होंने वंचितों की सेवा के लिए “दरिद्र नारायण सेवा संघ” और ”गीता प्रेस सेवा संघ“ का गठन भी किया।

गीता प्रेस से ही सन1927 में मासिक पत्रिका कल्याण का प्रकाशन आरम्भ हुआ जिसके संपादक के रूप में पोद्दार जी का पत्रकारिता के क्षेत्र में विषिष्ट स्थान है। ”कल्याण“ के संपादक के रूप में उन्हें विश्व भर में प्रसिद्धि और लोकप्रियता मिली। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने आध्यात्मिक विषयों पर ही लेखन किया। उन्होंने निबंधों एवं लेखों के अलावा विभिन्न टीका साहित्य का भी सृजन किया।

उन्होंने रामचरित मानस, विनयपत्रिका, दोहावली की विषद टीका प्रस्तुत की। कल्याण के लिए हनुमान जी ने जो नीति बनाई उसमें विज्ञापनों के लिए कोई स्थान नहीं था।गीता प्रेस से ही आगे चलकर कल्याण, कल्पतरु एवं महाभारत मासिक पत्रिका का प्रकाशन सन 1955 से लेकर 1966 तक चलता रहा।हनुमान जी की पत्रकारिता भारत की महान सनातन संस्कृति के यशोगान को समर्पित थी। गीता प्रेस से आज भी कल्याण मासिक पत्रिका का प्रकाशन उन्हीं नियमों के अनुरूप चल रहा है।

हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने गोपी प्रेम ,तुलसी दल, दाम्पत्य जीवन का आदर्श, दुख क्यों होते हैं, दुख में भगवत्कृपा, नारी शिक्षा, प्रेम दर्शन, भगवच्चर्या, भगवतप्राप्ति एवं हिंदू संस्कृति, लोक परलोक सुधार,शान्ति कैसे मिले, श्री भगवन्नाम चिंतन ,श्री राधा- माधव चिंतन, सत्संग के बिखरे मोती ,सुख शान्ति का मार्ग जैसी पुस्तकों के लेखन के साथ ही “सुखी बनो “ जैसी पुस्तक लिखकर कई संदेहों व संशयों को दूर करने का सफल प्रयास किया है।

हनुमान प्रसाद जी के पास बहुत सी चमत्कारिक शक्तियां भी थीं जिसके माध्यम से उन्होंने कई बार अनेक लोगों को चमत्कृत भी किया। कहा जाता है कि एक बार उन्होंने अपने किसी भक्त की मृत्यु के समय व दिन तक की आश्चर्यचकित करने वाली भविष्यवाणी तक कर दी थी। यही नहीं उन्होंने राम नाम जप के माध्यम से भी कई चमत्कार किये। कहा जाता है कि 16 दिसंबर 1927 को जसीडीह में 15लोगों की उपस्थिति में पोद्दार जी को भगवान शिव ने साक्षात दर्शन दिये थे।1936 में गीता वाटिका गोरखपुर में देवर्षि नारद और महर्षि अंगिरा ने भी उन्हें दर्शन दिये थे।

हनुमान प्रसाद जी ईश्वर के अनन्य भक्त थे अतः उन्हें भगवान की लीलाओं के दर्शन होते रहते थे। कभी -कभी वह भोजन करने के लिए बैठते थे और उनका ध्यान लग जाता था तो वह घंटो बैठे रह जाते थे। कल्याण पत्रिका संपादन के समय जब उन्हें कोई समस्या होती थी तब वह जिस देवता का ध्यान करते थे वो दर्शन देकर उनकी सभी समस्याओं का समाधान करते थे। हनुमान प्रसाद पोद्दार जी प्रवचन भी देते थे जिसे सुनने के लिए काफी श्रद्धालु उपस्थित होते थे।

पोद्दार जी ने घर- घर तक रामायण, महाभारत व अन्य समस्त हिंदू धर्म साहित्य को बहुत ही कम मूल्य पर घर -घर तक पहुंचाकर भारतीय जनमानस को पश्चिमी संस्कृति के विचारों का गुलाम बनाने से रोका तथा आध्यात्मिक ज्ञान को जीवित रखा। भारतीय सनातन संस्कृति की पताका पूरे विश्व में फहराने वाले पोद्दार जी ने 22 मार्च 1971 को नश्वर शारीर त्याग कर परलोक गमन किया।

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