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हर साल करीब 7.20 लाख लोग दे रहे जान, अपनों को आत्महत्या से बचाने के लिए मिजाज पर रखें ध्यान

अपने आसपास रहने वालों के मिजाज का ध्यान रखें तो कोई आत्महत्या नहीं कर पाएगा। मनोरोग विशेषज्ञों का शोध बताता है कि आत्महत्या करने वाले लोगों के व्यवहार में कुछ दिनों से बदलाव आना शुरू हो जाता है। यह लोग गुमसुम रहने लगते हैं। खुद को अलग-थलग कर लेते हैं। इसके अलावा कोई बड़ा नुकसान भी लोगों को आत्महत्या के लिए मजबूर बना देता है। 15 से 29 साल के बीच के युवाओं में इसकी प्रवृत्ति बढ़ी है, जो चिंताजनक है। देश युवा पीढ़ी को खोता जा रहा है। यह जानकारी किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख प्रो. विवेक अग्रवाल ने साझा की। वह मंगलवार को विभाग में ‘आत्महत्या की जिम्मेदार मीडिया रिपोर्टिंग’ विषय पर पत्रकारों से चर्चा कर रहे थे।

प्रो. विवेक अग्रवाल ने कहा की कई बार देखा गया है कि आत्महत्या की घटना होने पर मीडिया में आत्महत्या करने के तरीके को बता दिया जाता है। जिसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है, जिनके मन में आत्महत्या के विचार उत्पन्न हो रहे होते हैं। अध्ययन के मुताबिक दुनिया में प्रत्येक वर्ष करीब 7. 20 लाख लोग आत्महत्या कर रहे हैं। जबकि आत्महत्या का प्रयास करने का आकड़ा इससे 20 गुना अधिक है।

देश में हर साल 1.70 लाख से अधिक लोग करते खुदकुशी

डॉ. मोहिता जोशी ने बताया देश में आत्महत्या की समस्या भयावह रूप ले चुकी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2022 रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रत्येक वर्ष 1,70,924 लोग आत्महत्या कर जान गंवा देते हैं। इस तरह देश में हर साल करीब 34,18,480 लोग आत्महत्या का प्रयास करते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का आकलन है कि वास्तविक संख्या रिपोर्टेड मामलों से तीन गुना ज्यादा हो सकती है। इसका अर्थ है कि असल स्थिति कहीं अधिक गंभीर है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि तनाव, अवसाद, आर्थिक तंगी, पारिवारिक कलह और सामाजिक दबाव आत्महत्या की बड़ी वजहें हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि समय रहते मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाना, हेल्पलाइन सुविधाओं का विस्तार और समाज में खुलकर बातचीत करने का माहौल बनाना बेहद जरूरी है।

कुछ न्यूज चैनल्स में खुदकुशी दिखाना भी बड़ा कारण

मनोचिकित्सक डॉ. सुजीत कुमार कर ने बताया कि वर्ष 2020 में एक्टर सुशांत सिंह राजपूत केस के बाद देखा गया कि अचानक से आत्महत्या करने का ग्राफ बढ़ गया था। इसकी बड़ी वजह कुछ न्यूज चैनल्स में बार-बार केस को दिखाना। आत्महत्या के तरीके के बारे में बताना पाया गया। ऐसे ही कुछ फिल्में भी रिलीज हुईं उनमें भी आत्महत्या के तरीकों को बताया गया था। जिससे आत्महत्या की दर बढ़ गई थी। ऐसी खबरें आने से यदि किसी ने कभी प्रयास किया है तो दोबारा संभावना बढ़ जाती है।

आत्महत्या का कारण सिर्फ तनाव नहीं

डॉ. सुजीत कुमार के मुताबिक अक्सर आत्महत्या की पीछे तनाव बड़ा कारण माना जाता है, जबकि ऐसा नहीं हैं। इसके पीछे की वजह कई होती हैं। जिन पर खुलकर बात करने की जरूरत है। हमें समझना होगा की मरने से ज्यादा वजह जिंदा रहने की होती है। डॉ. आदर्श त्रिपाठी ने कहा कि आत्महत्या करना किसी समस्या का हल नहीं है। बल्कि यह परिवार के लिए दुखदायी होता है। आत्महत्या करने वाले अपनी परेशानी परिवार पर डाल देता है। जबकि उम्मीद नहीं खोनी चाहिए। ऐसी कोई परेशानी नहीं जिसका हल न हो। लिहाजा परेशानी से ज्यादा उसके निदान के बारे में विचार करने की जरूरत है। डॉक्टर की सलाह पर पूरा इलाज करें। काउंसलिंग कराएं। परिवार के लोग पीड़ित का सपोर्ट करें। समाज का साथ भी ऐसे लोगों के लिए जरूरी होता है। कार्यक्रम में डॉ. वंदना गुप्ता और डॉ. रश्मि शुक्ला ने भी जानकारी साझा की।

हाई रिस्क पर रहते हैं यह लोग

– कुछ भी समझ न पाना
– आर्थिक, सामाजिक, मानसिक या अन्य का नुकसान
– आवेग वाले व्यक्ति जो लोग परिणाम के बारे में नहीं सोचते
-ज्यादा नशा करने वाले
– परिवार में किसी ने किया हो

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