उत्तर प्रदेशप्रयागराज

प्रयागराज कैसे 1954 से लेकर 2025 तक कुंभ भगदड़ की कहानियों का रहा है गवाह? एक वकील ने सुनाई आपबीती

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर के वकील निरंजन लाल ने अपनी बुआ द्वारा सुनाई गई 1954 के कुंभ मेले की भगदड़ की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वह पानी में गिर गई थीं। उनके चाचा ने बाल पकड़कर उन्हें बाहर निकाला था। देश की आजादी के बाद इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में यह पहला कुंभ था और लाल द्वारा सुनाई गई दुखद घटना तीन फरवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर हुई थी।

पत्नी के साथ महाकुंभ गए थे वकील निरंजन लाल

आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, भगदड़ की इस घटना में सैकड़ों लोग मारे गए थे। मौनी अमावस्या के दिन ही 71 साल बाद, 29 जनवरी को प्रयागराज के महाकुंभ में फिर से भगदड़ मची जब विशाल भीड़ ‘अमृत स्नान’ के लिए त्रिवेणी संगम में उतरने की कोशिश कर रही थी। निरंजन लाल (67) अपनी पत्नी के साथ उस समय महाकुंभनगर के सेक्टर-छह में एक स्विस कॉटेज में थे, तभी उन्हें देर रात उनके बेटे ने फोन किया और भगदड़ के कारण संगम न जाने के लिए कहा।

सूर्योदय होने तक कॉटेज से बाहर नहीं आए

लाल ने ‘पीटीआई’ से कहा, ‘हम सूर्योदय होने तक कॉटेज से बाहर नहीं आए और पूर्वाह्न लगभग 11 बजे सेक्टर-छह के पास स्थित दशाश्वमेध घाट पर गए। मेला क्षेत्र में सड़कों पर और घाट पर भारी भीड़ थी। हम कुछ घंटों पहले हुए त्रासदी से अवगत थे इसलिए सतर्क थे और चूंकि हम स्थानीय निवासी हैं इसलिए हमें पता है कि भीड़ के बेकाबू होने की स्थिति में क्या करना है?’

इस तरह पूरी हुई परिवार की पीढ़ियों की परंपरा

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन, हम डरे नहीं और लौटे नहीं। मेरी पत्नी कल्पवास अवधि समाप्त होने तक वहीं रही, जिससे हमारे परिवार की कई पीढ़ियों की परंपरा पूरी हुई।’ लाल के परिवार के कई सदस्यों ने आजादी के बाद, यहां आयोजित सभी कुंभ मेलों में ‘कल्पवास’ और स्नान किए हैं।

बुआ को चाचा ने डूबने से बचाया था

लाल ने कहा, ‘1954 की घटना के बारे में मेरे चाचा और बुआ अक्सर बात करते थे। उन्होंने (बुआ ने) मुझे बताया कि जब वह डूब रही थीं, तो कैसे मेरे चाचा ने उन्हें बचाया था।’ लाल ने बताया कि उनकी बुआ का जन्म 1920 के दशक में हुआ था और 1986 में उनका निधन हो गया।

2013 के कुंभ मेले में हुई थी भगदड़

वहीं, 2013 के कुंभ मेले के दौरान इलाहाबाद जंक्शन (अब प्रयागराज जंक्शन) पर भी भगदड़ मची थी, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी। साल 1954 की भगदड़ के बाद एक जांच समिति गठित की गई, जिसने बेहतर भीड़ प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई सिफारिशें की थीं।

29 जनवरी को महाकुंभ में भगदड़

प्रयागराज में रहने वाली घरेलू सहायिका रेणु देवी ने पीटीआई को 29 जनवरी की घटना के बारे में बताया कि जिस दिन भगदड़ हुई, उन्होंने घाटों पर जूते-चप्पलों और थैलों के ढेर देखे थे तथा नदी में भी कई थैलियां नजर आईं। हालांकि, रेणु ने कहा, ‘मैंने इस महाकुंभ के दौरान पांच बार संगम में स्नान किया, ज्यादातर भगदड़ के बाद।’

66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने लगाई संगम में डुबकी

बारह साल में एक बार आयोजित होने वाला महाकुंभ इस साल 13 जनवरी (पौष पूर्णिमा) से 26 फरवरी (महाशिवरात्रि) तक आयोजित किया गया और इसमें नागा साधुओं ने शोभा यात्राएं निकाली और तीन अमृत स्नान हुए। इस धार्मिक आयोजन के दौरान रिकॉर्ड 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई।

मौनी अमावस्या की भगदड़ में 30 लोगों की जान गई

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 29 जनवरी को मची भगदड़ में कम से कम 30 लोगों की मौत हो गई और 60 लोग घायल हुए। हालांकि, कई विपक्षी दलों और उनके कई नेताओं ने मृतकों की संख्या को लेकर सवाल उठाए हैं और दावा किया कि मरने वालों की संख्या कहीं ज्यादा है। (भाषा के इनपुट के साथ)

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