धर्म-आस्था

क्यों कहते हैं, वक्रतुण्ड और एकदन्त गणेश जी को

(कुमकुम शर्मा-)
आइये सबसे पहले जानते हैं कि गणेश जी को वक्रतुण्ड क्यों कहते हैं। एक श्लोक के माध्यम से इस विषय को विस्तार से समझते हैं।
वक्रातुण्डावतारश्च देहानां ब्रह्मधारकः।
मत्सरासुरहन्ता स सिंहवाह्नगः स्मृतः।।
अर्थात ईश्वर द्वारा दिये गये वक्रतुण्ड यानि टेढ़ी सूंढ़ वाले शरीर को धारण करने वाले, ब्रह्मरूपी देह को धारण करने वाले, ईर्ष्या द्वेष और घमंड का नाश करने वाले तथा सिंह के वाहन पर चलने वाले भगवान श्रीगणेश का हम स्मरण करते हैं।
मुद्गल पुराण में गणेश जी के अनेक अवतार बताए गए हैं जिनमें आठ अवतार प्रमुख हैं। यहां आपको यह भी बताना जरूरी है कि मुद्गल पुराण गणेश जी को समर्पित एक मुख्य उप पुराण है। जिसमें गणेश जी की महिमा बताई गई है। इसे गणपति को मानने वाले लोग प्रमुख ग्रन्थ मानते हैं।
गणेश जी का पहला अवतार वक्रतुण्ड का ही है। इस सम्बन्ध में एक कथा है कि देवराज इन्द्र की लापरवाही से मत्सरासुर का जन्म हुआ। यहाँ आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि मत्सरासुर क्या है? तो यहाँ यह बताना जरूरी हो जाता है कि हिन्दू पौराणिक कथाओं में मत्सरासुर का मतलब ‘ईर्ष्या और ‘घमंड’ का राक्षस बताया गया है। इन्द्र की लापरवाही से बने इस राक्षस ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या करके उनसे शिव आराधना के पंचाक्षरी मन्त्र ‘ऊँ नमः शिवाय’ की दीक्षा ले ली और शिव जी की कठोर तपस्या की, उनकी आराधना से खुश होकर भगवान शंकर ने उसे अभय होने का वरदान दे दिया। शंकर जी से वरदान लेकर जब मत्सरासुर लौटा तब शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया। अन्य दैत्यों ने उसे विश्व पर विजय प्राप्त करने की सलाह दी। मत्सरासुर शक्ति और पद के मद में चूर था उसने पृथ्वी के समस्त राजाओं पर आक्रमण कर दिया। सभी राजा पराजित हो गये और समस्त पृथ्वी पर मत्सरासुर का शासन हो गया।
पृथ्वी पर कब्ज़ा करने के बाद उस असुर ने पाताल और स्वर्ग पर भी चढ़ाई शुरू कर दी। वरुण, कुबेर, यम आदि समस्त देवता उससे पराजित होकर भाग गये। उसने इन्द्र को भी पराजित कर दिया और स्वर्ग का सम्राट हो गया।
असुरों से दुःखी सभी देवता ब्रह्मा और विष्णु को साथ लेकर कैलाश पर्वत पर पहुंचे और भगवान शंकर से प्रार्थना की। शंकर जी से मत्सरासुर का घोर युद्ध हुआ किन्तु त्रिपुरारि शिव भी उसके समक्ष नहीं ठहर सके। उसने उन्हें भी जकड़ लिया और कैलाश का स्वामी बनकर रहने लगा। अब सब तरफ दैत्यों का अत्याचार फैल गया।
अब दुःखी देवताओं के पास दैत्यों से बचने का कोई उपाय नहीं था। तभी वहाँ भगवान दत्तात्रेय आ पहुंचे। उन्होंने देवताओं को वक्रतुण्ड के एकाक्षरी मन्त्र (गं) का उपदेश दिया। सभी देवताओं ने एकाक्षरी मन्त्र का जाप किया। उनकी आराधना से संतुष्ट होकर वक्रतुण्ड भगवान श्री गणेश जी प्रकट हुए और उन्होंने देवताओं को समझाया कि ‘‘मैं मत्सरासुर के घमंड को चूर-चूर कर दूंगा। भगवान वक्रतुण्ड ने अपने असंख्य गणों के साथ मत्सरासुर से युद्ध छेड़ दिया। अपने बेटों की मृत्यु से व्यथित होकर मत्सरासुर भगवान गणेश को भी अपशब्द कहने लगा, लेकिन भगवान वक्रतुण्ड ने क्रोधित होकर उसे अपनी शरण में आने के लिए कहा। मत्सासुर भगवान गणेश की शरण में आ गया उसकी सारी आसुरी शक्तियां क्षीण हो गईं। वह भयभीत होकर वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगा। भगवान ने उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर उसे भी अभय दान दिया और शेष जीवन पाताल लोक में बिताने का आदेश दिया। मत्सरासुर और समस्त देवगण वक्रतुण्ड भगवान की स्तुति करने लगे।
एकदन्त
इससे पहले हमने गणेश जी के प्रथम अवतार वक्रतुण्ड के बारे में जानकारी आपसे साझा की है। अब हम आपको गणेश जी के द्वितीय अवतार एकदन्त की कहानी को बताते हैं। इस सम्बन्ध में एक श्लोक है-
एकदन्तावतारौ वै देहिनां ब्रह्मधारकः।
यदासुरस्य हन्ता स आरवुवाहनगः स्मृतः।।
अर्थात भगवान गणेश का ‘एक दन्तावतार’ देहि ब्रह्म का धारक है और वह मद यानी घमंड रूपी असुर का नाश करने वाला है, इसका वाहन मूषक बताया गया है।
इस सम्बन्ध में एक कहानी प्रचलित है, पराक्रमी दैत्य मदासुर की। एक बार की बात है वह अपने पिता से आज्ञा लेकर दैत्य गुरू शुक्राचार्य के पास गया और स्वयं को शिष्य बनाने के लिए अनुरोध किया। उसने शुक्राचार्य से कहा मैं आपका शिष्य बनकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी बनना चाहता हूँ। आप मेरी इच्छा पूरी करने के लिये आज मेरा मार्गदर्शन कीजिये। शुक्राचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाकर उसे एकाक्षरी हृीं का शक्ति मन्त्र दिया।मदासुर गुरू को प्रणाम करके जंगल में तप करने के लिए चला गया। उसने वहाँ भगवती देवी का ध्यान करते हुए हजारों वर्षों तक तप किया। इस कठोर तपस्या के दौरान उसके शरीर पर दीमकों की बॉवी बन गई और उसके चारों तरफ वृक्ष और लताएं उग आईं। उसकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर देवी भगवती प्रकट हुईं। देवी ने मदासुर को निरोगी काया और सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर बिना किसी बाधा के शासन करने का वरदान दे दिया। मदासुर ने पहले पृथ्वी पर अपना साम्राज्य स्थापित किया फिर स्वर्ग पर चढ़ाई शुरू करके उसने देवताओं को भी जीत लिया और स्वर्ग का शासक बन गया। कहते हैं उसने प्रमदासुर की कन्या सालसा से विवाह किया जिससे उसको तीन पुत्र हुए। उसने अपनी अर्जित शक्ति से शूलपाणि भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। सभी जगह असुरों का शासन चलने लगा। पृथ्वी पर धर्म-कर्म को मानने वाले लुप्त हो गये। देवता और ऋषि अत्यन्त दुःखी हो गये। सर्वत्र हाहाकार मच गया।
चिन्तित देवगण सनत्कुमार के पास गये और असुरों के विनाश और धर्म स्थापना का उपाय पूछने लगे। तब सनत्कुमार ने कहा कि आप सभी मिलकर श्रद्धापूर्वक भगवान एकदन्त की उपासना कीजिये। वे सन्तुष्ट होकर अवश्य ही आपका मनोरथ पूरा करेंगे। सनत् ऋषि के कहे अनुसार देवताओं ने एकदन्त भगवान की उपासना प्रारम्भ की। तपस्या करते हुये जब सौ वर्ष पूरे हो गये तब मूषक यानी चूहे के वाहन वाले भगवान एकदन्त प्रकट हुये और उनसे वर मांगने के लिए कहा। तब देवताओं ने मदासुर के अत्याचार और धर्म की स्थापना के लिये निवेदन किया। उधर देवर्षि ने मदासुर को यह सूचना दे दी कि देवताओं ने भगवान एकदन्त को प्रसन्न कर लिया है अब वे तुम्हारा संहार कर देंगे। यह सुनते ही मदासुर क्रोधित होकर भगवान एकदन्त से युद्ध करने के लिए चल पड़ा। भगवान एकदन्त यह पता लगते ही रास्ते में ही प्रकट हो गये। राक्षसों ने जब देखा कि एकदन्त महाराज मूषक पर सवार होकर इधर ही आ रहे हैं तो वे डर गये क्योंकि उनकी आकृति अत्यन्त भयानक थी। उनके हाथों में परशु, पाश आदि आयुध थे। असुरों ने मदासुर को कहा कि यदि अपने प्राणों की रक्षा चाहते हो तो देवताओं से द्वेष रखना छोड़ दो। उनका राज्य उन्हें वापस कर दो लेकिन वह नहीं माना और युद्ध के लिए तैयार हो गया। जैसे ही उसने धनुष पर बाण चढ़ाया चाहा तभी भगवान एकदन्त का तेज फरसा उसे लगा और वह बेहोश हो गया। जब वह होश में आया तो उसे समझ में आ गया कि ये सर्वसमर्थ परमात्मा ही हैं। उसने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुये हुए कहा, ‘हे प्रभो! आप मुझे क्षमा करें और अपनी भक्ति प्रदान करते हुए मुझे अपनी शरण में ले लें। एकदन्त भगवान ने कहा कि जहाँ मेरी पूजा-आराधना हो, वहाँ तुम बिलकुल नहीं आना। आज से तुम्हारा निवास पाताल में होगा। देवतागण भी प्रसन्न होकर एकदन्त की स्तुति
करने लगे और स्वर्ग लोक को चले गये तभी से गणेश जी को एकदन्त भी कहा जाता है। (साभार हिफी)

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